क्या करे कोई !

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अब क्या किसी के इश्क का दावा करे कोई,
करता नही है कोई कि चर्चा करे कोई !

क्या जुर्म है ये इश्क?करो सात जन्म तक,
चाहे सता सता के भी रूठा करे कोई!

आँधी से भी चराग बुझाये न अब बुझे,
फिर महफिलो में क्यों सर नीचा करे कोई !

हर वस्ल बाद हिज्र का होना तो तय है तब,
फिर वस्ल का भी क्यों तो ये वादा करे कोई !

जिन्दा रखे है घाव, दिखाए किसे किसे,
बँधे तबीब के हाथ यहाँ, क्या करे कोई !

नीशीत जोशी

तीर जब रोज़ चल रहें हैं अब

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जब मुहब्बत में दर्द पाना है,
किस लिए दिल यहां लगाना है !

इम्तिहाँ प्यार की कहाँ तक दें,
जब सवालों में ही फसाना है !

पी लिया जह्र सोचकर ये जब,
मौत ही आखरी ठिकाना है !

रातभर चैन से जो सोते हो,
ख्वाब अक्सर मेरे ही आना है !

बेवफा तुम नहीं तो क्या हो फिर,
वो खयानत भी क्या बहाना है ?

करते हो प्यार जब मुझे तुम तब,
शर्म में वक्त क्यों गवाना है ?

तीर जब रोज़ चल रहें हैं अब,
हर नया घाव ‘नीर’ खाना है !

नीशीत जोशी ‘नीर’

यूं तेरा कुछ गुनगुनाना याद है

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२१२२-२१२२-२१२२-२१२
रात ख़्वाबों में जगा कर वो सताना याद है,
हमको दिल की बेक़रारी का बढ़ाना याद है !

लिख रहे थे नाम किसका रेत पर दिलसाज़ से,
फिर उसीका नाम लिखकर वो मिटाना याद है !

दिल्लगी करते रहे तुम प्यार के उस नाम से,
फिर मेरा ही नाम लेकर खिलखिलाना याद है !

वस्ल की उस शाम को शरमा रहे थे तुम तभी,
वो तेरा दाँतो से होंठो को दबाना याद है !

क़ैस की वो बात सुनकर हंस पड़े थे जिस तरह,
फिर उसे राज़ो-नियाज़ी में जताना याद है !

बारिशों में भीग कर तुम लग रहे थे बेनज़ीर,
फिर यकायक बाम पर मुझको बुलाना याद है !

रोशनी करते रहे पढ़कर ग़ज़ल वो ‘नीर’ की,
महफ़िलो में यूं तेरा कुछ गुनगुनाना याद है !

नीशीत जोशी ‘नीर’

અહીં તે દુ:ખ નો અધ્યાય પણ વંચાય છે શું?

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તમારી વાતથી આ માણસો ભરમાય છે શું?
કરીને પ્રેમ પાછા એ બધા સંતાય છે શું?

અહીં સાથે રહેવાના કરે છે કોલ પ્રેમી,
કહો તો ઝીંદગી આખી કદી સચવાય છે શું?

કહે છે મહફિલો લાગે સુની સાકી વગરની,
અહીં કોઈ શરાબી પણ હવે મુંઝાય છે શું?

હજી બાકી રહ્યા છે કોડ પૂરા કોણ કરશે,
અહીં અજવાળુ પરદાથી કહો ઢંકાય છે શું?

લખું છું દર્દ તો લોકો કરે છે વાહ વાહી,
અહીં તે દુ:ખ નો અધ્યાય પણ વંચાય છે શું?

નીશીત જોશી

वस्ल का वादा नहीं हुआ

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२२१ २१२१ १२२ १२१२
इतना शदीद ग़म का अँधेरा नहीं हुआ,
साथी बने बहुत पर तुमसा नहीं हुआ,

हमने बना लिया वो घरोंदा यहीं कहीं,
फिर भी सुकूँ मिले वो बसेरा नहीं हुआ,

एक तुम मिले हमें,वो खुशी भी रही सदा,
फिर दिल किसी मुहिब्ब का प्यासा नहीं हुआ,

बढते रहे कदम, पुरजोशी रही मेरी,
दिल में मगर सफर का सवेरा नहीं हुआ,

जज्बात जब्त में रखकर हम रुके रहे,
वो हिज्र में भी वस्ल का वादा नहीं हुआ !

नीशीत जोशी 21.10.16

समझूँगा

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तू अदावत कर, उसे मैं तो मुहब्बत समझूँगा,
झूठ भी गर बोलदो, मैं तो सदाकत समझूँगा !

याद में जीना मेरा, दुस्वार ऐसा है की अब,
मौत को भी आज, तौफा ए इबादत समझूँगा !

झख्म देना ही, तेरी फितरत अगर है, तो तू दे,
मैं उसे बाकायदा, अपनी अमानत समझूँगा !

दिल दिया था, भूल तो की थी नहीं कोई मैंने,
हो गये तुम गैर के, अपनी फलाकत समझूँगा !

आजमाना छोडदो अब, हमसफर बन जाओ तुम,
बेवफा हो भी गये गर तो, अलालत समझूँगा !

निशीथ जोशी
(अदावत-hatred,सदाकत-truth,फलाकत-misfortune,अलालत-sickness)  18.10.16

आँखो से पिलाना आ गया

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झूठ को जब आजमाना आ गया,
मेरी ठोकर पे जमाना आ गया,

तीरगी से अब कौन डरता है यहाँ,
चाँद को जब से बुलाना आ गया,

इश्क को हमने कभी समझा नहीं,
बस हमें उसको निभाना आ गया,

आइने के सामने होकर खडे,
जिस्म को झूठा सजाना आ गया,

रूह जिन्दा है मेरी मर कर यहाँ,
कब्र से जज्बा जताना आ गया,

खेलना आता नहीं फिर भी मुझे,
हार कर बाजी जिताना आ गया,

खोल कर आँखे निहारा ख्वाब भी,
जब वो ख्वाबो को सजाना आ गया,

‘नीर’ कुछ है महफिलो का भी सुरूर,
और आँखो से पिलाना आ गया !

निशीथ जोशी ‘नीर’     15.10.16