वाह वाही

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रू ब रू होने लगी थी वाह वाही,
चश्म तब ढोने लगी थी वाह वाही !

रात उनके ख्वाब भी आने लगे थे,
नींद में खोने लगी थी वाह वाही !

हाज़री दी जब ग़रूर को भूल कर तब,
फूट कर रोने लगी थी वाह वाही !

चाँद शरमाया तुझे ही देखकर जब,
फर्श पर होने लगी थी वाह वाही !

दर्द को मैंने वरक़ पर जब उतारा
बज़्म में होने लगी थी वाह वाही !

नीशीत जोशी ‘नीर’

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