तीर जब रोज़ चल रहें हैं अब

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जब मुहब्बत में दर्द पाना है,
किस लिए दिल यहां लगाना है !

इम्तिहाँ प्यार की कहाँ तक दें,
जब सवालों में ही फसाना है !

पी लिया जह्र सोचकर ये जब,
मौत ही आखरी ठिकाना है !

रातभर चैन से जो सोते हो,
ख्वाब अक्सर मेरे ही आना है !

बेवफा तुम नहीं तो क्या हो फिर,
वो खयानत भी क्या बहाना है ?

करते हो प्यार जब मुझे तुम तब,
शर्म में वक्त क्यों गवाना है ?

तीर जब रोज़ चल रहें हैं अब,
हर नया घाव ‘नीर’ खाना है !

नीशीत जोशी ‘नीर’

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