क्या करे कोई !

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अब क्या किसी के इश्क का दावा करे कोई,
करता नही है कोई कि चर्चा करे कोई !

क्या जुर्म है ये इश्क?करो सात जन्म तक,
चाहे सता सता के भी रूठा करे कोई!

आँधी से भी चराग बुझाये न अब बुझे,
फिर महफिलो में क्यों सर नीचा करे कोई !

हर वस्ल बाद हिज्र का होना तो तय है तब,
फिर वस्ल का भी क्यों तो ये वादा करे कोई !

जिन्दा रखे है घाव, दिखाए किसे किसे,
बँधे तबीब के हाथ यहाँ, क्या करे कोई !

नीशीत जोशी

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