शब भर हक़ीक़त छोड़िये

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2212 2212 2212 2212

शब भर हक़ीक़त छोड़िये अब ख़्वाब भी होता नहीं,
फिर भी उसी की आस में मैं रात भर सोता नहीं !

आसाँ नहीं है प्यार को करना मुक़म्मल इस तरह
कोई भी अबतो प्यार का इक बीज भी बोता नहीं !

कैसे जसारत पाए हम यह प्यार पाने के लिए,
उस बेवफा के प्यार का अब बोझ दिल ढोता नहीं !

कोई घरोंदा है नहीं दिल की हिफाजत जो करें,
ताहम ये दिल भी दर्द से अब तो यहां रोता नहीं !

खानातलाशी तो बहुत कर दी यहां अब बस करो,
तस्कीन है इस बात का अब दिल कहीं खोता नहीं !

नीशीत जोशी
(जसारत – हिम्मत, ताहम-तो भी, खानातलाशी-खोई चीज की छीनबीन करना, तस्कीन-सन्तोष)

ढाओ न मुझ पर यूँ सितम

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2212/2212

होती नहीं है, बात अब,
कटती नहीं है, रात अब !

होते नहीं है, ग़म भी कम,
खामोश है, जज्बात अब !

गर खेल माने प्यार को,
जीते मगर, है मात अब !

दुनिया बनी है, प्यार से,
नफरत की मत कर बात अब !

ढाओ न मुझ पर यूँ सितम,
क्या हो सितमगर जात अब !

नीशीत जोशी

क्या डरना

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अगर उतरें है दरिया में तो गहराई से क्या डरना,
किसीसे लग गया हो दिल तो रुसवाई से क्या डरना !

चलोगे गर अंधेरो में जला कर उन चरागो को,
न कोई गर नजर आये तो परछाई से क्या डरना !

तेरे दीदार से अब होश ही सब उड गये दिलबर,
रहा बेहोश मैं हूँ जब तो पुरवाई से क्या डरना !

हमारे प्यार की बातों पे हंगामा तो है बरपा,
हुई है यूँ मुहब्बत जब तो आश्नाई से क्या डरना !

हो जब तुम साथ फिर हरपल तो लगता है मुझे दिलकश,
हुआ है प्यार जब दिल से तो रानाई से क्या डरना !

खुदा माना है जब तुझको ज़ुकेंगे प्यार के आगे,
मुहब्बत है मुझे, उसकी जबीँसाई से क्या डरना !

हमारी जब जला कर खाक कर दी है ये बस्ती तब,
वो तन्हाई में कैसी भी हो यकजाई से क्या डरना !

नीशीत जोशी

हर शाम को

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2212-2212-2212

यादें तेरी आने लगी हर शाम को,
आकर वो शरमाने लगी हर शाम को !

तुम फिक्र करते हो उदासी की यहाँ,
अब रूह भी घबराने लगी हर शाम को !

वो याद भी सजकर मिली थी फिर मुझे,
वो दर्द सहलाने लगी हर शाम को !

कोई नजर तो डालकर देखो जरा,
आँखें भी तडपाने लगी हर शाम को !

पल पल सताती है फिज़ा मुझको यहाँ,
सूरत भी मुरझाने लगी हर शाम को !

नीशीत जोशी

बन गया

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तीरगी लेने तुम्हारी, मैं उजाला बन गया,
फिर चुरा कर अश्क सारे, मैं फसाना बन गया !

नाम जो बदनाम था पहले, वो बातें अब नहीं,
मैं तुम्हारे इश्क़ में, पागल दिवाना बन गया !

देखना लहरों की ओर, अच्छा लगा इतना मुझे,
मैं उन्हे पाने को, दरया का किनारा बन गया !

इक मुनाज्जिम ने कहा, तन्हा रहोगे तुम सदा,
तबसे तन्हाई से मेरा, राब्ता सा बन गया !

महफिलों में रिंद सब, मदहोश थे, पी कर शराब,
चश्म ही मेरे लिये तो, सा’द प्याला बन गया !

नीशीत जोशी
(मुनाज्जिम- ज्योतिषी)

कुछ तो और थी

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2122-2122-2122-212

लब रहे गूंगे मगर वो बात कुछ तो और थी,
फिर हुई जो आँख से बरसात कुछ तो और थी,

वो तबस्सुम ने रखा था बाँध कर के चाँद को,
जश्न में उसने गुजारी रात कुछ तो और थी,

मरहबा कहने को मशरूफी जो कोई हो गयी,
आज उनके घर की नक्शाजात कुछ तो और थी,

खेलते बाज़ी रहे हम रोज उनके साथ में,
जीत लेते हम मगर वो मात कुछ तो और थी,

ये सजा है या सताने का तरीका बोल तू,
प्यार करके दिल पे करती घात कुछ तो और थी !

नीशीत जोशी

हम वफा करते

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2122-1212-22

वो खुदा से कोई दुआ करते,
और मुझसे न फिर दगा करते !

दर्द की इंक़िज़ा भी हो जाती,
हमसफर प्यार में रहा करते !

इश्क का रोग जब लगा सबको,
मेरे दिलबर मेरी दवा करते !

याद आते कभी वो बीते पल,
अश्क आँखो से फिर बहा करते !

वो अगर बेवफा है फितरत से,
इश्क़ में सिर्फ हम वफा करते !

नीशीत जोशी
(इंक़िज़ा – समाप्ति)