यूं तेरा कुछ गुनगुनाना याद है

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२१२२-२१२२-२१२२-२१२
रात ख़्वाबों में जगा कर वो सताना याद है,
हमको दिल की बेक़रारी का बढ़ाना याद है !

लिख रहे थे नाम किसका रेत पर दिलसाज़ से,
फिर उसीका नाम लिखकर वो मिटाना याद है !

दिल्लगी करते रहे तुम प्यार के उस नाम से,
फिर मेरा ही नाम लेकर खिलखिलाना याद है !

वस्ल की उस शाम को शरमा रहे थे तुम तभी,
वो तेरा दाँतो से होंठो को दबाना याद है !

क़ैस की वो बात सुनकर हंस पड़े थे जिस तरह,
फिर उसे राज़ो-नियाज़ी में जताना याद है !

बारिशों में भीग कर तुम लग रहे थे बेनज़ीर,
फिर यकायक बाम पर मुझको बुलाना याद है !

रोशनी करते रहे पढ़कर ग़ज़ल वो ‘नीर’ की,
महफ़िलो में यूं तेरा कुछ गुनगुनाना याद है !

नीशीत जोशी ‘नीर’

जानता हूँ कि मुझसा मिलेगा नही

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212-212-212-212

साथ कोई मेरे जब रहेगा नहीं,
अश्क भी आँख से तब रुकेगा नहीं !

याद आ कर सताने लगा क्यूँ मुझे,,
दिल तेरे सामने पर ज़ुकेगा नहीं !

गुफ्तगू प्यार की करता था वो बहुत,
तोड के दिल मेरा अब कहेगा नहीं !

उस कहानी में होगा मेरा दर्द भी,
इस लिये दास्ताँ वो सुनेगा नहीं !

अब नहीं है कोई ग़म मुझे हिज्र का,
जानता हूँ कि मुझसा मिलेगा नही !

हो मसायब भी उस राह में गर मेरी,
दर्द अफ़्ज़ा कभी तो दिखेगा नहीं !

तू सितम कर सनम दर्द भी दे, मगर,
प्यार ये ‘नीर’ का जो मिटेगा नहीं !

नीशीत जोशी ‘नीर’
(मसायब=मुसीबतें,दर्दअफ्ज़ा=दर्द बढानेवाला)

कभी कोई कभी कोई

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1222-1222-1222-1222

मुहब्बत आजमाता है, कभी कोई कभी कोई,
कहानी फिर बनाता है, कभी कोई कभी कोई !

तेरी आवाज का जादू, न रह पाया, यहाँ अब तो,
गज़ल फिर,क्यों सुनाता है,कभी कोई कभी कोई !

मेरा दिलबर कभी आये मेरे वीरान इस दिल में,
बहानें क्यों बनाता है, कभी कोई कभी कोई !

हमारे प्यार का चर्चा जमाने भर में है शायद,
तभी तो दिल जलाता है, कभी कोई कभी कोई !

मसायब आ गयी तब, दर्दअफ़्ज़ा जब मिला होगा,
तभी पलकें भिगोता है, कभी कोई कभी कोई !

सभी से ही यहाँ आगे निकलने को करे जहमत,
कि रस्ते से हटाता है, कभी कोई कभी कोई !

हुआ होगा उसे गम, ‘नीर’ की भी मौत पर लेकिन,
खुशी यूँ ही जताता है, कभी कोई कभी कोई !

नीशीत जोशी ‘नीर’
(मसायब=मुसीबतें, दर्दअफ़्ज़ा=दर्द बढ़ानेवाला)

गज़ल की ये कैसी इबारत हुई है !

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122-122-122-122

तेरे इश्क की जब से शोहरत हुई है,
हरएक सिम्त से मुझ पे लानत हुई है !

सितम देख लो मेरी किस्मत के यारो,
कि इक बेवफा से मुहब्बत हुई है !

तमन्ना थी दिल में करे प्यार कोई,
मगर मुझ से कैसी शरारत हुई है !

कभी इक बेबस को खुश कर दिया था,
यही इक मुझ से इबादत हुई है !

नहीं छोड पाया है दिल पर कोई नक्स,
गज़ल की ये कैसी इबारत हुई है !

दिआ साथ सच का हरएक बात में जब,
मेरी अच्छी खासी फज़ीहत हुई है !

मैं जिन पर मिटा हूँ सदा ‘नीर’ उनको,
मुझे आज़माने की चाहत हुई है !

नीशीत जोशी ‘नीर’

मिला है ये तजुर्बा आशकी से !

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बहुत उकता गया जब शायरी से,
मिला तब दर्द मुझको जिंदगी से !

गज़ल कहकर छुआ था तेरे दिल को,
खुशी मिल तो रही थी तिश्नगी से !

नकाबो में ही रहते है यहाँ सब,
मिलेगा बस वो धोखा आदमी से !

खता भी गर हुई होगी मेरी जब,
खुदा होगा कभी खुश बंदगी से !

कभी तो तू भरोशा कर मेरा भी,
सदा मैं तो रहा हूँ सादगी से !

मुहब्बत में नहीं कोई किसीका,
मिला है ये तजुर्बा आशकी से !

कभी तन्हा कभी बरबाद हो जा,
शिकायत ‘नीर’ की कर मुस्तदी से !

निशीत जोशी ‘नीर’

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

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करोगे याद तो हर बात याद आएगी,
हमारे वस्ल की हर रात याद आएगी !

गुजारे वक्त का कोई हिसाब तो होगा,
कभी तो दी हुई सौगात याद आएगी !

खिलाडी हो बखूबी जीत का मज़ा लेना,
पुराने खेल की हर मात याद आएगी !

सफर में जो हुआ था वो कहें किसे दिलबर,
मिली थी हमसफर की घात याद आएगी !

बहारें लौट आने का सबब करे कोई,
तभी पतझड़ को भी औकात याद आएगी !

अधूरा प्यार जब जब याद आ रहा होगा,
वो दी थी ‘नीर’ को खैरात याद आएगी !!

नीशीत जोशी ‘नीर’

नहीं कमजोर तू

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वो है गर बेवफा तो, बेदार हो जा,
वफा की दे दुहाई, दिलदार हो जा !

गुना है इश्क गर, मत सोच फिर तू,
उसे कर, और गुन्हेगार हो जा !

तुझे गर रोशनी की इल्तजा है,
किसी सूरज का रिश्तेदार हो जा !

सुना कर फिर नया कोई तराना,
सभी के बीच इक फनकार हो जा !

नहीं कमजोर तू,उस मर्द से भी,
बढा कर तू कदम,हमवार हो जा !

नीशीत जोशी