सुनी पड़ी है ये महफ़िल तेरे बगैर

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आज तुम याद बेसुमार आते हो,
आ के तसव्वुर में फिर बहलाते हो,

दौड़ती है काटने को तन्हाईया,
आँखों में अश्क़ तुम भर जाते हो,

खुम है मय है साक़ी है तेरे लिए,
फिर मयक़दे को क्यों तरसाते हो?

रोशन कर दो फिर से हर चराग,
मायुसो का दिल क्यों जलाते हो?

सुनी पड़ी है ये महफ़िल तेरे बगैर,
महफ़िले सरताज़ तुम कहलाते हो !

नीशीत जोशी 25.12.14

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हसीं पल थे

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हसीं पल थे गुजर गए कुछ पल में,
चले गए हर कोई आनेवाले कल में,

वक़्त का क्या फिर से आ सकता है,
मगर न मुक़्क़मल होगा ऐसे बल में,

समंदर में तलातुम होना लाज़मी है,
आप ले के आये उसे नदी के जल में,

हमें मिला आप सभी का ये जो साथ,
खुदा ने दिया है अच्छे कर्म के फल में,

इन्तजार रहेगा ऐसे ही कोई जश्न का,
डूब जाए हमातन फिरसे ऐसे ही पल में !!!!

नीशीत जोशी (तलातुम=storm,हमातन=fully) 21.12.14

घर में तू सब की लाडली

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चिड़ियों की तरह चहकती थी,खुश्बू की तरह महकती थी,
घर में तू सब की लाडली,सभी की घडकन में धड़कती थी,

बड़ी हुयी जब तू ,सपने भी खुद के सजोने लगी लाजवाब,
बातें तेरी घर के कोने कोने में पायल की तरह खनकती थी,

उतर आया चाँद से एक राजकुमार,ले जाने तुजे अपने साथ,
हो जाएगा घर वीरान बात यही हमारे जहन से उभरती थी,

नियति है करनी होगी बिदा तो कर लिया है दिन मुक़्क़मल,
जिम्मेवारी बढ़ेगी,थम जायेगी बर्फ सी जो कूदती उछलती थी,

इम्तिहान अब शुरू होगा जिंदगी का असल ‘ओ, लाड़ली’,
भरोषा है आओगी अव्वल, तू अव्वल आना ही समझती थी !!!!

नीशीत जोशी 06.12.14

चॉंद को छत पे अब बुलायेगा कौन

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रूठोगे जो अब तुम मनायेगा कौन,
रोओगे जो अब तुम हसायेगा कौन,

तन्हाई काटती होगी रात होगी सुनी,
होगी जब सुबह फिर जगायेगा कौन,

जिक्र होगा महफिल में नाम का तेरा,
वहाँ ईश्क की गजल सुनायेगा कौन,

हसीन लम्हो की आयेगी बहोत यादें,
खींच के तेरा दुप्पटा सतायेगा कौन,

छत की सीढीयाँ बहाती होंगी आंसू ,
चॉंद को छत पे अब बुलायेगा कौन !

नीशीत जोशी 21.11.14

रुसवा सारा ज़माना हुआ

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बढ़ा जब दर्द दिल में, क़लम को जुबाँ आयी,
महबूब की बातें, न जाने हमें ले कहाँ आयी,

करते रहे जिक्र वफ़ा का, बेवफा की बाहों में,
बहते रहे अश्क़ आँखों से, गुफ्तगू वहाँ आयी,

समझते रहे सिकंदर, मुक्क़दर का खुद ही,
मगर मुझे हाथ की लकीरे नजर कहाँ आयी,

मनाते हुए उनको रुसवा सारा ज़माना हुआ,
नफ़रत की सभी के हाथो जैसे कमां आयी,

क़त्ल किया मेरा, कातिल अदाओने उनकी,
आखिर शहरे खामोशा तक मेरी जाँ आयी !!!!

नीशीत जोशी (कमां= command) 17.11.14