कटती है जिंदगी, राह के पत्थरो सी

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तेरी आँखों के पैमाने, हमने पिये है,
फिर भी तिश्नगी में ही, हम जिये है,

गूंजती है आवाझ, दिल के कूचे से,
पर तेरे वादो ने, ओठ मेरे सिये है,

तकदीर समझ बैठे, प्यार को तेरे,
रातो ने भी देखो, कैसे ख्वाब दिये है,

दिल तोड़ने कि,वो हरकत तेरी थी,
बेवफाई कि तोहमत, मेरे लिये है,

कटती है जिंदगी, राह के पत्थरो सी,
ठोकरो में रहकर, गिरियाँ में जिये है !!

नीशीत जोशी 22.11.13

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परिन्दे अपनी परवाज पे नाज करता है

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परिन्दे अपनी परवाज पे नाज करता है,
अर्श पे पहोच के कहाँ आवाज करता है,

बुलंदी टिकती नहीं किसीके पास ज्यादा,
गुमानी में क्यूँ लोगो को नाराज करता है,

करके नफ़रत दिल को जीता नहीं जाता,
प्यार बांटनेवाला ही दिल पे राज करता है,

मिलती रहती है दाद हिम्मत कि उसे ही,
जो बेझिझक सच्चाई से आगाज करता है,

अंधेरो कि हुकूमत जब पड़ती है खतरे में,
जुगनू तब खुद की रोशनी पे नाज करता है !!

नीशीत जोशी 20.11.13

પરબીડિયું બીડી દીધું છે આજ

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પરબીડિયું બીડી દીધું છે આજ,
મોકલવવા તેણે કીધું છે આજ,

પ્રેમ લાગણીઓ સમજાશે હવે,
પાન પ્રેમરસ નું પીધું છે આજ,

હતો કદાચ તેનો પથ અટપટો,
મળવાનું મુજને સીધું છે આજ,

જે દિલ સાચવી રાખેલું તેમણે,
મેં એ દિલ જીતી લીધું છે આજ,

તરસ્યો રાખેલો આજ દિન સુધી,
આંખોથી પીવાનું કીધું છે આજ.

નીશીત જોશી 19.11.13

चलो हम कोई एक समंदर बन जाये

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चलो हम कोई एक समंदर बन जाये,
मझधार पहोच कर भंवर बन जाये,

बचाकर हर डूबती हुयी कश्ती को,
चलो उसकी आसान सफ़र बन जाये,

कहते है बात प्यार में अंधे होने कि,
जता के प्यार उनकी नजर बन जाये,

कुछ सुने और सुनाये महफ़िल-ए-इश्क़ में
बहर सिखके नायाब सुखनवर बन जाये,

दास्ताँ-ए-इश्क़ में जिक्र हमारा भी हो,
चलो बेपायां प्यार करके अमर बन जाये !!!!

नीशीत जोशी 16.11.13

આપણે નહી મળીયે

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એ તો નક્કી છે હવે જીવનભર આપણે નહી મળીયે,
તો પછી કહો ઈશ્વર થી ઉમર લઇ આપણે શું કરીએ?

બનીને રહશે બધી એ ક્ષણો હૃદય ની યાદો માહી,
તો પછી એ પડછાયા ને શા માટે શોધતા ફરીએ?

દરિયા ને ઉલેચી ઉલેચી નયનોમાં રાખીશું સાચવી,
તો પછી એવા ટીપે ટીપે શાને ખોબા ભરતા રહીએ?

મળ્યો’તો પ્રેમ એક આશીર્વાદ રૂપે જે કરતા રહીશું,
તો પછી એ પ્રેમ ને ઈશ્વરી અભિશાપ શાને કહીએ?

કરવા પૂર્ણ અભિલાષા મળતો હોય છે બીજો જનમ,
તો પછી હૃદય વેદના ના રોદણા શાને રોતા રહીએ?

નીશીત જોશી 14.11.13

जिधर भी देखु,तेरा साया नजर आता है

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बीते लम्हो कि यादो का, पहर आता है,
जिधर भी देखु,तेरा साया नजर आता है,

सामने होते हुए समंदर, रहता हूँ तिश्ना,
तिश्नगी मिटाने, तन्हाई का जहर आता है,

जिंदगी भी लगने लगी है, पतझड़ जैसी,
बिन पत्तो का जैसे नजर, शजर आता है,

निकल पड़ते है, बेताबी से राह-ए-सफ़र पे,
बातो में जब, मुहिब्ब का शहर आता है,

क़यामत तो तब हो जाती है, सोते सोते,
रातो को ख्वाब बनकर, कहर आता है !

नीशीत जोशी 12.11.13

वो शख्स परेशान क्यों है ?

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दिलकश महफ़िल में, वो शख्स परेशान क्यों है ?
खुद अपने घर में ही , इंसान मेहमान क्यों है ?

नाम कुछ संतो के शामिल है, दरिंदो के संग,
कुछ लोगो कि नजर ये हादसा, नागहान क्यों है?

सो जाते है फुटपाथों पे, भूखे पेट जब गरीब,
मंदिरो में तब, लगे प्रसाद का नुक़सान क्यों है?

लगा दी है, तहवारो पे पाबंदी, शोरो गूल कि,
मगर आतंकीओ के, बेदाग़ गिरेबान क्यों है?

महंगाई के बोझ तले, पीस रहा है इंसान,
खामोश रह के, देखनेवाले निगहबान क्यों है?

नीशीत जोशी 10.11.13