कलम


उन कोरे कागज़ पे चल पड़े कलम,
स्याही न हो तो खून से चले कलम,

ख़त लिखना कोई आसां नहीं होता,
प्यार के जज्बात वास्ते जले कलम,

चिठ्ठी में लिखना तो है बहोत मगर,
उनके एक नाम से आगे न बढे कलम,

लिख जो पाऊं नाम-ए-महेबूब के आगे,
जहां के किस बाज़ार से ऐसी ले कलम,

वो ख़त भी बन जाये बेमिसाल किताब,
अगर महेबूब के अहेसास को पढ़े कलम !

नीशीत जोशी 26.10.12

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देख लेंगे


आओगे जो तुम, तुम्हारा नूर देख लेंगे,
सबके ओठो पर नाम मशहूर देख लेंगे,

एक पत्थर को तराशते रहे हो तुम यहाँ,
उसी पत्थर को बनाते कोहिनूर देख लेंगे,

आ जाना कनीज़ की गलियों में कभी तो,
ना देख पाए जन्नत तो क्या हूर देख लेंगे,

खुदा की रहेमत है बनायी जो खूबसूरती,
आओगे जो आज, तुम्हे मामूर देख लेंगे,

लाख रहो परदे में छुप के जो महेफिल में,
तेरी कमसिन नजरो के मखमूर देख लेंगे !

नीशीत जोशी (मामूर = पूर्ण ,मखमूर= नशे में चूर) 25.10.12

यह जनम भी अब लगता है गुजर जाएगा


यह जनम भी अब लगता है गुजर जाएगा,
मुहोब्बत के वास्ते जिस्म भी ऊपर जाएगा,

रूठने मनाने का जो दस्तूर था मुहोब्बत में,
जन्नत देखके क्या प्यार से मुकर जाएगा?

बगैर महेबूब रास न आयेगी जन्नत की हवा,
उसे देखके मौसम भी वहां का सुधर जाएगा,

सुके शजर पे भी आ जायेंगे खुश्बूदार फूल,
उसे छू के हवा का ज़ोंका जो उधर जाएगा,

रोशनी की अजमत का भी हो जाएगा नाम,
चाँद गर उसे देखके खिलने से मुकर जाएगा !

नीशीत जोशी 24.10.12

हम उनकी जुबाँ पे अपना नाम तक ला न सके


बसा कर भी दिल में उन्हें कभी पा न सके,
बन कर राहबर भी मंजिल तक जा न सके,

बुलाना चाहे पर उनकी मजबूरियो ने रोका,
ख्वाइश रहते भी आशियाने तक आ न सके,

ऐसे तो गुनगुनाते थे उनके नाम की गज़ले,
रूबरू जो हुए बन कर गूंगे कुछ गा न सके,

दस्तूर है मुहोब्बत में निगाहें चार होने का,
उठा न सके हया का परदा, प्यार पा न सके,

जहाँ के लोग दिल में कैसे बना लेते है जगह,
हम उनकी जुबाँ पे अपना नाम तक ला न सके !

नीशीत जोशी 18.10.12

चले आना


आये जो याद तो खयालो मे चले आना,
दुर हो तो क्या हुआ सपनो मे चले आना,

कहते हो तस्वीर बनाके छुपायी है दिलमे,
धुंधली लगे तस्वीर, आँखों में चले आना,

रहना यही कही इर्द-गिर्द ही सांज-सवेरे,
लहराते उन हवा के जोंको में चले आना,

तन्हाई में लगे गर फुल मुरजाने चमन के,
बदलके रुख मौसम का बहारो में चले आना,

सन्नाटा बहोत होता होगा उस वीराने में,
बनके बोल, परिंदों की आवाजो में चले आना !

नीशीत जोशी 16.10.12

કેમ ફરીને લાવું


તુજને ભૂલી જવાની હિંમત કેમ કરીને લાવું,
કહો,હવે કોના ભારી કલેજાને ભરખીને લાવું,

પછીનો બીજો શ્વાસ આવે છે તુજની રહમતે,
કહો, આ હૃદયે હવે કોના શ્વાસો ભરીને લાવું,

એકએક પળ નીકળે છે એકએક ભવ માફક,
પણ એ કહો, બીજી જિંદગી કેમ મરીને લાવું,

જુઓ આ દરિયો પણ ચડ્યો છે કેવા તોફાને,
કિનારા મુઝાય છે કે લહેરો કેમ તરીને લાવું,

આ જન્મે બનાવ્યો છે મનુષ્ય તુજને ભજવા,
તુજ ભજવા કાજ બીજો જન્મ કેમ ફરીને લાવું.

નીશીત જોશી 15.10.12

हो जाती है


ये जमाने में मुहोब्बत भी सजा हो जाती है,
दारु भी कभी कभी यहाँ पे दवा हो जाती है,

कदम थक जाते है चल के मुश्किल राह पर,
हमसफ़र रहे साथ तो रूह जवां हो जाती है,

रूठ जाये जो प्यार में मान जाने की शर्त पे,
रुसवाई भी उनकी वल्लाह अदा हो जाती है,

शराब के पिने से नशा तो चड़ता जरूर होगा,
महेफिल में लड़खड़ाते पाँव खता हो जाती है,

उनके यहाँ पर भी अजीब वो दस्तूर को देखा,
वफ़ा की बाते अगर करे तो खफा हो जाती है !

नीशीत जोशी 14.10.12