नींद आती नही


उन्हे रातो को नींद आती नही है,
पलके मीठे सपने सजाती नही है,

यादो का मंझर कम ही नही होता,
पूरानी यादे जहन से जाती नही है,

तस्सवूर में रह जागना अच्छा नही,
कोइ लाश वापस सांस पाती नही है,

अंधेरे के डर से न कुछ हासिल होगा,
वो चराग कि लौ घर जलाती नही है,

इतिहास के पन्नो से बाहर नीकलो,
अश्को को पलके अब उठाती नही है,

दूआ है चैन कि नींद आ जाये आज,
अपनो की दूआ फिजूल जाती नही है ।

नीशीत जोशी

मुलाकात


आज फिर उनसे मुलाकात हुयी,
फिर भी कोई न खास बात हुयी,

आरजू दिल में लिए बैठे रहे,
न कोइ बात की शुरुआत हुयी,

वो जो पूछे हमारे दिल की बात
वो बयां करने में मुश्किलात हुयी,

तेरे खामोश से लब कह गए कुछ
आँखों आँखों में सारी रात हुयी,

चादनी रात,साथ हम दोनों
प्यार के रंग में बरसात हुयी |
नीशीत जोशी

मुस्कान


हम तेरी मुस्कान के मुन्तजीर रह गये,
पर लोग रश्क से अल्फाजो को कह गये,

मोहब्बत के समंन्दर में डुब जाते मगर,
एक वायदे पर उस तूफान में भी बह गये,

सीख रखा था हमने चोट खाने का हुन्नर,
वोह देते गये हम हर घाव बखुबी सह गये,

तीरछी नजरो से देखते हुए बीना कुछ बोले,
मुश्कुराते रहे, हम वोही मुस्कान पे दह गये,

बेतासिर बना दिया था उस मुस्कान ने हमे,
आखिर हर गझल में उन्ही का नाम कह गये ।

नीशीत जोशी 27.02.12
मुन्तजीर= one who is awaited, रश्क = jealousy, बेतासिर= useless

जाए तो कहां?


कहा अब नही आते, न आने से दिलको बुरा लगता है,
भले हो मशहुर गलीया,ये दिलका कुचा सुना लगता है,

जैसे भी दुरीया गर रखनी है तुजे, रखो मेरे हमनवाज,
मेरी हरएक सांसमे सिर्फ तेरा ही नाम गुंजता लगता है,

महसुस हमने भी किया है, ईन्तजार मे हर रातका रोना,
करवट बदलते रहते है बिस्तर भी कंटक सा लगता है,

अचानक उठ जाते है रात मे, सताता है अंधेरो का डर,
चीराग कि रोशनी में खुदका साया भी डरावना लगता है,

और तुम कहते हो, ” हम नही आयेंगे,जाओ “, लेकिन,
जाए तो कहां?हर तरफ हर चहेरा हमे तुज जैसा लगता है ।

नीशीत जोशी

जीन्दगी बसर कर गये


जीन्दगी बसर कर गये मगर जीये नही,
हालत पे कभी अपनी भरोषा किये नही,

गुजर जाता रहा कारवा युहीं बे-मंजील,
राहोको कभी मंजीलका रास्ता दिये नही,

वोह जहर अगर देते तो पी भी लेते हम,
दुसरो के हाथो दिया अमृत भी पीये नही,

प्यार कि दास्तां सुनना अच्छा लगता था,
इसलिये प्यारके अल्फाज कभी सीये नही,

बदनाम न हो जाये कहीं जमाने के सामने,
अपनो के बीच कभी उनका नाम लिये नही।

नीशीत जोशी

मकतूल थे हम


मकतूल थे हम, मकतल मेरा दिल बनाया,
कब्र पहोचाके उसने आंखो को झिल बनाया,

वाह रे उनकी महोब्बत ? उसको क्या कहेना,
जीने नही दिया,मरने को भी मुश्किल बनाया,

आलि माने थे पर दिये उसने आबेचश्म मुजे,
सीतम सहकर भी उसे हमने बिस्मिल बनाया,

चश्मेजाम पी के मखमूर बन अदम हो गये थे,
आशुफ्तः हो कर भी हमने उसे साहिल बनाया,

महोब्बत कि राह के वोह काहिल क्यों रह गये?
इनाम दे कर मुजे महोब्बत का जाहिल बनाया ।

नीशीत जोशी

नजर


तेरी नजर का ही कसूर था,
जीसे पाके मै तो मगरूर था,

घायल फिरते रहे गलीओमें,
जीस शहरमें मै मशहूर था,

ऐसी नजरोने कयामत ढायी,
पर प्यार वास्ते मजबूर था,

ना देखे तो सब बेजान लगे,
दिल का वही चश्मे-नूर था,

नजरे उठती लगता पैमाना,
उसे पीना प्यारका गुरुर था,

मदहोश हो गये नीगाहो से,
वो नशा उतरना तो दूर था ।

नीशीत जोशी