पैसा कहीं काला नहीं होगा

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वो पहले था जो कारोबार अब वैसा नहीं होगा,

तिजारत तो सही पैसा कहीं काला नहीं होगा !

यहाँ हर आदमी हैरां है अपने मुल्क का यारों,

परेशानी बढा कर खुद कभी महंगा नहीं होगा !

हरारत में उठा होगा कदम बक्सा न जायेगा,

कहीं तो हो गये है नामज़द ऐसा नहीं होगा !

रहो खुद साफ तो कोई बिगाडेगा नहीं कुछ भी,

लिबास-ए-जि़न्दगी फट जाएगा मैला नहीं होगा !

मगर कोॆई कहाँ सुनता किसीकी है यहाँ अब तो,

यही सब सोचते है की कभी चरचा नहीं होगा !

नीशीत जोॆशी ( नामज़द = प्रसिद्ध)

पहले मुहब्बत कर

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अमां पहले मुहब्बत कर,
गजल की फिर इबारत कर !

मेरे दिल में तू रह बेशक,
मगर कुछ तो शराफत कर !

कभी आ कर मुझे बहला,
कभी तू भी शरारत कर !

तुझे ही दिल दिया मैंनें,
उसे रखना अमानत कर !

रहूँ खुश दोस्ती से मैं,
न देकर ग़म अदावत कर !

नीशीत जोशी
(इबारत=composition,अदावत= दुश्मनी)

यह ग़ज़ल ही जिंदगी का सार है

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2122-2122-212
यह ग़ज़ल ही जिंदगी का सार है,
जीत ली थी वो मगर अब हार है !

वो मंजर तो इस समंदर पार है,
अब सफीना भी मेरा मझधार है !

है बहुत साथी मगर कबतक मेरे,
कुछ भी कहने पर दिखे अग़्यार है !

बदसलूको की गुलामी क्यों करें,
वो है ही जबतक उसे दरकार है !

अब नये ग़म और आँसू भी नये,
जिंदगी जीना मेरा दुश्वार है !

देख कर तुम आइना डर क्यों गये,
चेहरा तो रोज का फनकार है !

प्यार को मौजूद अंदर ही रखा,
‘नीर’ का तो बस यही असरार है !

नीशीत जोशी ‘नीर’
(अग़्यार=strangers,rivals
असरार=secret)

हर तरफ चर्चा रहा अपनी मुहबब्त का

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2122 2122 2122 212

आते जाते आईने से गुफ्तगू होती रही,
फिर मुहब्बत की मुझे बस आरजू होती रही !

प्यारका मुझपे वो जादू इस कदर छाया कि बस,
आप से तुम और तुम से फिर वो तू होती रही !

वस्ल की कोई खुशी मुझको नही होगी यहाँ,
हिज्र की जबसे मुझे तो साद खू होती रही !

खत लिखा था और भेजा भी नहीं मुझको कभी,
काशिदो की बात से अब ये सबू होती रही !

हर तरफ चर्चा रहा अपनी मुहबब्त का मगर,
दोस्त सब नाराज,आँखें भी अदू होती रही !

नीशीत जोशी
(खू =आदत,सबू =सबूत,अदू = दुश्मन)

कभी हम भी मनाते थे

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1222-1222-1222-1222

मेरा बचता नहीं कुछ भी, मुहब्बत की कहानी में,
मुझे सब सोंप कर, सूरज उतर जाता है पानी में !

जलाकर राख कर दे गर, मेरे वो अक्स अब सारे,
मगर उनको रखूंगा बस, मेरे दिल की निशानी में !

नये किस्से अधूरे ही रहेंगे, अब यहाँ सुनलो,
भरा है दर्द इतना वो, मेरी यादें पुरानी में !

फिज़ा भी प्यार की दोस्तो, न पहले सी यहाँ है अब,
मजा तो तब मिला था, वो मुझे अपनी जवानी में !

हमारे प्यार के किस्से, कभी मशहूर थे फिर भी,
भुली दास्ताँ सुनाते है, तुझे अपनी जुबानी में !

कभी तुमने मनाया था कभी हम भी मनाते थे,
मुहब्बत आजमाते थे तभी दिलकश रवानी में !

निशीत जोशी

दिल भी बेचैन सा लगे हर पल

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2122-1212-22
जब किसी से वो प्यार होता है,
प्यार फिर बेशुमार होता है !

तेरी आँखें कभी नही रोयी,
प्यार में आबशार होता है !

दिल दिया तब तो बेखबर थे हम,
दिल पे कब अख्तियार होता है !

दिल भी बेचैन सा लगे हर पल,
वस्ल को बेकरार होता है !

टूट जाए जो दिल, लिए ग़म को,
आदमी तार तार होता है !

नीशीत जोशी
(आबशार= waterfall)

वो आ के बज़्म में, अपनी ग़ज़ल सुनाने लगे !

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1212-1122-1212-22/112
वो आ के बज़्म में, अपनी ग़ज़ल सुनाने लगे !
इसी बहाने, मुहब्बत मुझे जताने लगे !

मैं अपना दिल ही, मुहब्बत में जिन को दे बैठा ,
सितम तो देखए, दामन ही वो बचाने लगे !

यकीन कीजिए, सब पेड़ कट गया होगा ,
परिंदे परदे पे, जब घोंसले बनाने लगे !

चली भी आओ, ज़रा बाम पर मिरी खातिर ,
फलक का चाँद, न मुझ को कहीं सताने लगे !

तमाम राहों को, फूलों से भर दिया जिन की ,
हमारी राह में, कांटे वही बिछाने लगे !

नीशीत जोशी